भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए
लोक संगीत
कविता कोश विशेष क्यों है?
कविता कोश परिवार

ये लाए हैं उस गली में जा कर / मेला राम 'वफ़ा'

Kavita Kosh से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

ये लाए हैं उस गली में जा कर
हम आय हैं खून में नहा कर

वो दिल भी चुरा के ले गया है
गुज़रा जो अभी नज़र चुरा कर

तेरा पता उन से कौन पूछे
ख़ुद खो गई जो तुझ को पा कर

इक खेल है बुत-गरे-अज़ल का
ये तोड़ना बुत बना बना कर

ढलने की नहीं शबे-ग़म ऐ दिल
सो जाइये शमए-जां बुझा कर

हो जाएंगे बे-नक़ाब अग्यार
पछताओगे मुझ को आज़मा कर

जाने वाला न वापस आया
रुख़्सत हुए लोग रो रुला कर

जाना है वहीं हमें भी इक दिन
आया न जहां से कोई जा कर

दर आये चमन में किस के वहशी
क्यों हंस पड़े फूल खिल खिला कर

कर लेते हैं अपना ग़म ग़लत हम
ग़म के दर्दीले गीत गा कर

होते नहीं दे दिला के भी अब
होते थे जो काम मिल मिला कर

ये बात है पस्त हिम्मती की
क़िस्मत का गिला न ऐ 'वफ़ा' कर।