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योग्य वर / सुकुमार राय

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पोश्ता गया था, वहाँ किसी ने बताया
बेटी का ब्याह तू तो ठीक कर आया!
योग्य वर गंगाराम, ठीक चुना भय्ये
बाक़ी ख़बर हम देंगे अगर कुछ चहिए।
लड़का बुरा नहीं, है खू़ब देखा-भाला
रंग, हाँ, कुछ दबा हुआ, बल्कि कहो, काला।
चेहरे की गढ़न गो उलूक-जैसी, नहीं ख़ास,
पढ़ा-सुना अच्छा है, सभी बोलें शाबास।
फेल हुआ मैट्रिक में एक कम बीस बार
अतिक्रांत हो करके तब डाला हथियार।
काम-धाम? पैसा-कौड़ी? बड़ा बुरा हाल यार
भाई एक पागल है, दूसरा पक्का गँवार।
तीसरा जो जानकार, वो तो गया जेल-वेल,
जाली नोट छाप लिए, चलाने में हुआ फेल।
छुटका तबलची है, पाँच टका पाता है
मासिक, नौटंकी में तबला बजाता है।
गंगाराम को रहता तिल्ली-ज्वर हर छिन
पीलिया से पीड़ित है, ख़ानदानीै लेकिन।
महाराजा कंस का है वंशधर, बताते हैं,
लाहिड़ी महाशय भी रिश्ते में आते हैं।
सारा करके विचार हमें भई लगता है
योग्य वर ढूँढ़ा है, नहीं कोई खटका है।

सुकुमार राय की कविता : सत्पात्र (সৎপাত্র) का अनुवाद
शिव किशोर तिवारी द्वारा मूल बांग्ला से अनूदित