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रँगे अधर / रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’

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97
विष में बुझी
भोंकी शब्द -कटार
हँसे जीभर।
98
सोचा था कभी-
ज़माना बदलेंगे,
मिटाया हमें।
99
झूठ का तूल
बार -बार उड़ाया
नापा आकाश।
100
अब तो चलें !
तमाशा खूब बने
रोना न कभी।
101
जोगिया भेस
उदास हुई साँझ
बनी योगिनी।
102
रँगे अधर
गहन अनुराग
सिंचित नभ।
103
नेह के नाते
शब्दों की पकड़ में
कभी न आते।
104
किसे क्या दिया
सिर्फ वही तो जाने
मैं अनजान।