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रंग लुटाती वर्षा आई (कविता) / शिवराज भारतीय

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उमड़-घुमड़ कर बादल उमड़े
सनन्-सनन् चलती पुरवाई,
रिमझीम-रिमझी कदम ताल से
रंग लुटाती वर्षा आई।

बाग-बगीच लगे महकने
मोर ख़ुशी से लगे थिरकने,
झूमें-चहके पंछी सारे
कोयल कूक-कूक मुस्काई।
रिमझीम-रिमझी कदम ताल से
रंग लुटाती वर्षा आई।

छप-छप पानी में सब कूदें
थप-थप करके बनें घरौंदें,
टुन्नु-मुन्नु ने कागज की
रंग-रंगीली नाव चलाई।
रिमझीम-रिमझी कदम ताल से
रंग लुटाती वर्षा आई।

कल-कल छल-छल नदिया उमड़ी
भर गए सारे ताल-तलाई,
रून झुन बैल चले खेतों में
मिट्टी की खुश्बू मन भाई।
रिमझीम-रिमझीम कदम ताल से,
रंग लुटाती वर्षा आई।