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रहेगा मुब्तलाये-कश-म-कश इन्साँ यहाँ कब तक / सीमाब अकबराबादी

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रहेगा मुब्तलाये-कश-म-कश इन्साँ यहाँ कब तक?
यह मुश्तेख़ाक पर जंगे-ज़मीनो-आसमाँ कब तक?

यह आवाज़ेदरा[1], बाँगेजरस, मुहमिल-से[2] नग़्मे हैं।
चलेगा इन इशारों के सहारे कारवाँ कब तक?

मैं अपना राज़ खुद कहकर न क्यों खा़मोश हो जाऊँ?
बदल जाती है दुनिया, ऐतबारे-रज़दाँ कब तक?

ब-क़दरे-यक-नफ़सग़म माँग ले और मुतमइन हो जा।
भिखारी! यह मनाज़ाते-निशाते-जाविदाँ कब तक?


शब्दार्थ
  1. घंटी की आवाज़
  2. निरर्थक