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रात भर चान नभ में चमकते रहल / भोलानाथ 'भावुक'

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रात भर चान नभ में चमकते रहल,
केहू बेचैन करवट बदलते रहल।
रात ओकर मुकुर में निहारत कटल,
टेम दियना के काँपत सिसकते रहल।
जब से से अल्हड़ उमरिया के लागल नयन,
तब से लागल नयन ना तरसते रहल।
रात भर हार मोती के छिटकल जवन,
ले उषा ओके दुनिया प सजते रहल।
आँख मलते लली अनमुनाहे उठल,
आँख से चू के काजर पसरते रहल।
आग बिरहा के दिल में जे लागल तवन,
ना बुताइल ऊ ‘भावुक’ सुलगते रहल।