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रात भर नींद नहीं आई / हरीश भादानी

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रात भर
नींद नहीं आई !
तन की सूजन
मन पर के कुछ घाव खरोंचे-
सिरहाने बैठी ख़ामोशी
गरम-गरम फोड़ो से धोती रही
रात भर-
आँखों के आगे खिच-खिचते
कई रंगों,
रेखाओं के अतीत पर
धुनी अँधेरा रहा फिराता
एक रंग की बुरश
रात भर-
और देखते ही रहते-
एक थकन की लम्बी उम्र गुजरती
बैठे-बैठे इन्तजारते
पर बहुत पुराने परिचित जैसी,
द्वार-द्वार आहटती ?
आंगन-आंगन, गली खोजती
एक सुबह आगई बुलाने
कह दिया-
अनींदे ही चलने को!