भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए
लोक संगीत
कविता कोश विशेष क्यों है?
कविता कोश परिवार

राम-नाम नहि हिरदै धरा / दरिया साहब

Kavita Kosh से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

राम-नाम नहि हिरदै धरा, जैस पसुवा तैसा नरा॥
पसुवा-नर उद्यम कर खावै, पसुवा तो जंगल चर आवै।
पसुवा आवै पसुवा जाय, पसुवा चरै औ पसुवा खाय॥
राम-नाम ध्याया नहिं माईं, जनम गया पसुवाकी नाईं।
राम-नामसे नाहीं प्रीत, यह सब ही पशुओंकी रीत॥
जीवत सुख-दुखमें दिन भरै, मुवा पछे चौरासी परै।
जन 'दरिया' जिन राम न ध्याया, पसुवा ही ज्यों जनम गँवाया॥