भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए
लोक संगीत
कविता कोश विशेष क्यों है?
कविता कोश परिवार

रुपहली लटें / जय गोस्वामी / रामशंकर द्विवेदी

Kavita Kosh से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

उम्र तो कुछ हो ही गई है,
फिर भी कभी-कभी
लगता है आज भी तुम बालिका हो ।

खोजा जाए तो
बाद में मिल जाएगी
केशों में रूपहली धार

खोजने का भार दिया था
कभी-कभी तुमने मुझे

मैं तो बालक नहीं हूँ,
इसीलिए आज स्तब्ध होकर रह गए हैं
रूपहली लटें खोजने वाले हाथ ।

तुम तो अब उठोगी ?
घर जाओगी ?
बरामदे में उतरने लगी है रात ।

मूल बाँगला भाषा से अनुवाद : रामशंकर द्विवेदी