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रुस्वाइयाँ गज़ब की हुईं तेरी राह में / शाद अज़ीमाबादी

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रुस्वाइयाँ ग़ज़ब की हुईं तेरी राह में।
हद है कि ख़ुद ज़लील हूँ अपनी निगाह में॥

मैं भी कहूँगा देंगे जो आज़ा[1] गवाहियाँ।
या रब! यह सब शरीक थे मेरे गुनाह में॥

थी जुज़वे-नातवाँ[2] किसी ज़र्रे में मिल गई।
हस्ती का क्या वजूद तेरी जलवागाह में॥

ऐ ‘शाद’! और कुछ न मिला जब बराये नज़्र[3]
शर्मिंदगी को लेके चले बारगाह में[4]


शब्दार्थ
  1. इंद्रियां
  2. निर्बलता के परमाणु
  3. ईश्वर को भेंट करने के लिए
  4. मंदिर में