भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए
  काव्य मोती
लोक संगीत
कविता कोश विशेष क्यों है?
कविता कोश परिवार

रोक्या कंवळै धागै बाबा / सांवर दइया

Kavita Kosh से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

रोक्या कंवळै धागै बाबा
सुणो अठै सूं आगै बाबा

आ डाडी है कांटा आळी
कुण चालैला सागै बाबा

हवा देख बदळैला ऐ तो
म्हानै आज आ लागै बाबा

कीं चिलको सो दीस्यो एकर
घनख अंधारो आगै बाबा

ढाई आखरां रो धन जोड़
रात-रात ऐ जागै बाबा