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रोती सजनी / रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’

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85
उड़ा है पाखी
सप्त सिन्धु के पार
लौटे न लौटे
86
घायल डैने
अश्रु नयन-कोर
कोई न देखे ।
87
सपने देखे-
कल्याण सदा करूँ
सहे प्रहार ।
88
पोर-पोर में
जब भरा ज़हर
पी न सकोगे ।
89
विक्षिप्त है वो
जनहित जो करे
दु:ख ही भरे ।
90
तुतली बोली-
दिल एक बनाओ
साथ ले जाओ।
91
रोती सजनी
ग़ुमसुम रजनी
ढूँढके हारी।
92
निशि-वासर
आशीष बाँटे लाखों
शापित हुए ।
93
द्वेष की आग
जीभरके जलाए
कोई न बचे ।
94
जीवन भर
जिनके लिए जागे
वे थे अभागे ।
95
विवेक-शून्य
निपट अन्धे लोग
सूर्य को कोसें।
96
सारे सम्बन्ध
सिर्फ़ कर्मों का भोग
भोगना पड़े ।