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लज्ज़त-ए-दर्द-जिगर याद आई / 'क़मर' मुरादाबादी

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लज्ज़त-ए-दर्द-जिगर याद आई
फिर तेरी पहली नज़र याद आई

दर्द ने जब कोई करवट बदली
जिंदगी बार-ए-दिगर याद आई

पड़ गई जब तेरे दामन पर नज़र
अज़मत-ए-दीद-ए-तर याद आई

अपना खोया हुआ दिल याद आया
उन की मख़्मूर नज़र याद आई

दैर ओ काबा से जो हो कर गुज़रे
दोस्त की राह-गुज़र याद आई

देख कर उस रूख-ए-जे़बा पे नकाब
अपनी गुस्ताख नज़र याद आई

जब भी तामीर-ए-नशेमन की ‘कमर’
यूरिश-ए-बर्क-ओ शरर याद आई