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लट्ठे दी चदार उत्ते सलेटी रंग माहिया / पंजाबी

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   ♦   रचनाकार: अज्ञात

लट्ठे दी चदार उत्ते सलेटी रंग माहिया
आवो सामणे कोलों दी रुस के न लंग माहिया
 
चन्ना कंदा तूं मरिया अख वे
साडे आटे दे विच हथ वे
लट्ठे दी चादर उत्ते सलेटी रंग माहिया
आवो सामणे कोलों दी रुस के न लंग माहिया
 
चन्ना वेख के न साडे वाल हस वे
साडी माँ पइ करेंदिये ए शक वे
लट्ठे दी चादर उत्ते सलेटी रंग माहिया
आवो सामणे कोलों दी रुस के न लंग माहिया
 
गल्लां गोरियां ते काला काला तिल वे
सन्नू अज पिछवाड़े मिल वे
लट्ठे दी चादर उत्ते सलेटी रंग माहिया
आवो सामणे कोलो दी रुस के न लंग माहिया
 
गल्लां गोरियां ते काला काला तिल वे
साड़ा कड़ के लेगया दिल वे
लट्ठे दी चादर उत्ते सलेटी रंग माहिया
आवो सामणे कोलो दी रुस के न लंग माहिया
 
तेरी माँ ने चाडया साग वे
असां मंग्या ते मिलया जवाब वे
लट्ठे दी चादर उत्ते सलेटी रंग माहिया
आवो सामणे कोलो दी रुस के न लंग माहिया
 
तेरी माँ ने चाड़ियाँ ए गंदालां
असां मंगियाँ ते पैगयिया दंदलान अनवां
लट्ठे दी चदार उत्ते सलेटी रंग माहिया
आवो सामणे कोलो दी रुस के न लंग माहिया
 
तेरी माँ ने चेद्य ए खीर वे
अस्सां मांगी ते पैगई पीढ वे
लट्ठे दी चादर उत्ते सलेटी रंग माहिया
आवो सामणे कोलो दी रुस के न लंग माहिया
 
साड़े दिल विच की की वासियां
न तूं पुछियाँ ते न असी दसियाँ
लट्ठे दी चादर उत्ते सलेटी रंग माहिया
आवो सामणे कोलो दी रुस के न लंग माहिया