भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए
लोक संगीत
कविता कोश विशेष क्यों है?
कविता कोश परिवार

लेनिन से संवाद / व्लदीमिर लेनिन

Kavita Kosh से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

घूमता घटनाचक्र
एक नहीं, कई कामों के लिए प्रतिबद्ध!
 
रात की परछाईं पसरते ही
धीरे-धीरे डूब ही जाता है दिन
अब दो लोग हैं कमरे में
सफ़ेद दीवार पर टंगी
लेनिन की तस्वीर और मैं
कि खिसकने लगती है ऊपर की ओर खूँटी
ऊपर उठे उसके होंठ की तरह
कुछ बोलने के लिए मानो
अभी झटके से खुल पड़ेगा उसका मुँह
 
तनाव से सिकुड़ती
गहन सोच-विचार में जकड़ी,
अपनी विशाल सोच की तरह ही
घनेरी उसकी भँवें
 
पताकाओं का जंगल
और उनके साये में
कूच करती हज़ारों की भीड़
घनी झाडियों से उठे उनके अनगिनत हाथ
 
हर्षोल्लास से दमकते
उन्हें देखने की उत्कण्ठा से
उठ पड़ता हूँ मैं अपनी जगह से
उनका अभिवादन करने के लिए
उनके बारे में जानकारी हासिल करने के लिए
 
कामरेड लेनिन!
(दफ़्तर से मिले निर्देश की
महज खानापूर्ति की तरह नहीं
अपितु पूरी निष्ठा व लगन से)
मैं उनके बारे में बताना चाहूँगा तुम्हें
 
बेहद मुश्किल काम
जिसे पूरा करने के लिए दर-दर भटक रहे हैं हम
ज़रूर पूरा होगा
और जो लगभग पूरा हो भी गया है
 
ज़रूरतमन्दों को दे रहे हैं हम
खाना और कपड़े साथ बिजली भी
भर दिए गए हैं
कोयले और लोहे के भण्डार
पर चारों ओर बिखरा
रक्तरंजित मलबा उठाने के लिए
हमारे पास अब थोड़ी रक़म बची है
 
तुम्हारे बगैर
कितने ही हैं जो बेरोज़गार हो गए
और यही है एकमात्र सारे फसाद और
सारे झगड़े की वज़ह
 
कितनी ही काई
हमारी मातृभूमि की सीमाओं पर
और भीतर जमी पड़ी है
  
उन्हें चिन्हित करो
और समझा दो
बज चुकी है रणभेरी
 
कई प्रजातियाँ हैंं उनकी
वे उतने ही खतरनाक हैं:
जैसे बिच्छू और ज़मींदार
उनमें से कुछ
जो बरबादी की राह पर चल पड़े:
वे पियक्कड, कट्टरपन्थी और चाटुकार हैं
 
वे मोर की तरह
घमण्ड में चूर
घूमते हैं चारों ओर
अपने सीने पर क़लम
और बिल्ला चिपकाए
 
हमें उन्हें प्रशिक्षित करना ही होगा
लेकिन उन्हें प्रशिक्षित करना इतना आसान भी नहीं
 
बर्फ़ से ढँकी ज़मीन हो,
या हरे-भरे मैदान,
या हो कारख़ाने
हमेशा हर जगह
हमारे दिल में होते हो तुम
 
कामरेड लेनिन !
हम बनाएँगे,
हम सोचेंगे,
हम साँस लेंगे,
हम जीवित रहेंगे,
और इस तरह
डटकर मुकाबला करेंगे हम
 
घटनाओं का एक चक्र
एक नहीं, कई कामों के लिए संकल्पबद्ध
धीरे-धीरे डूब ही गया दिन
पसरने लगी है रात की परछाईं
और अब दो व्यक्ति हैं कमरे में
सफ़ेद दीवार पर
लेनिन की तस्वीर और मैं !
 
अँग्रेज़ी से अनुवाद -- नीता पोरवाल