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लैंडस्केप-2 / गुलज़ार

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कोई मेला लगा है परबत पर

सब्ज़ाज़ारों पर चढ़ रहे हैं लोग

टोलियाँ कुछ रुकी हुईं ढलानों पर

दाग़ लगते हैं इक पके फल पर

दूर सीवन उधेड़ती-चढ़ती,

एक पगडंडी बढ़ रही है सब्ज़े पर !


चूंटियाँ लग गई हैं इस पहाड़ी को

जैसे अमरूद सड़ रहा है कोई !