भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए
लोक संगीत
कविता कोश विशेष क्यों है?
कविता कोश परिवार

वक़्त को मुख़्तलिफ़ रफ़्तार से चला लेंगें / रवि सिन्हा

Kavita Kosh से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

वक़्त को मुख़्तलिफ़[1] रफ़्तार से चला लेंगें
आज हर लम्हे की मीआद[2] हम बढ़ा लेंगें

गर्मिये-ज़ीस्त[3] पर बादे-ख़िज़ाँ[4] के झोंके हैं
बुझ गया दिन अगर तो शाम ये सुलगा लेंगें

क़ायदे खेल के हैं खेल में ही खो जाना
राह क्या ढूँढना मंज़िल यहीं बना लेंगें

रौशनी ओढ़ के सोता है अँधेरे का शहर
बज़्मे-बेदार[5] में कुछ और हम जला लेंगें

वक़्त दरिया हुआ तैराक कुछ हुए हम भी
और हाइल[6] हुए तो शक्ले-जाविदाँ[7] लेंगें

शब्दार्थ
  1. अलग अलग (varying)
  2. विस्तार (range)
  3. जीवन की गर्माहट (warmth of life)
  4. पतझड़ की हवा (autumn winds)
  5. जागने वालों की महफ़िल (assembly of the awake)
  6. रुकावट (obstacle)
  7. शाश्वत या चिरन्तन का रूप (form or shape of eternal)