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वह / निकलाय रुब्त्सोफ़ / अनिल जनविजय

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वह अभी
बिल्कुल बच्ची है
आवाज़ तक उसकी कच्ची है
खेलों की दुनिया में उलझी
मन से एकदम सच्ची है

— चलो, चलें उस जंगल में
जहाँ गाती है कोयल
थोड़ा भीतर तक जाएँगे
जहाँ बेंच पड़ी एक पाएँगे
हो जाएँगे आँखों से ओझल

— चलो, दौड़ें उस खेत में
मैं चढ़ती हूँ पेड़ पर
तुम बैठो उस मेड़ पर
मैं सहमत-सा होता हूँ
मन पर बोझा-सा ढोता हूँ !

मन में ख़ुद से
मैं लड़ता हूँ
जीवन में सब कुछ है झेला
ऊँच-नीच सोच के मरता हूँ
जब होता उसके साथ
अकेला !

कभी
उदास वह होती है
और कभी इतनी गम्भीर
शायद घबरा जाए वह सुनकर
मेरी उलझन
मेरी पीर !

क्यूँ घूमूँ मैं
उसके साथ
क्यूँ जाता हूँ जंगल
क्यूँ सुनता हूँ कोयल को
वो जंगल में करती मंगल !

मूल रूसी भाषा से अनुवाद : अनिल जनविजय