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वायरस / अनिल अनलहातु

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"कहीं कछु आही की ना आही"—-कबीर
'कहीं कुछ है या नहीं' , पूछा उसने
ईश्वर से।
ईश्वर मौन रहा,
उसे बुद्ध याद आये
और उनका मौन याद आया।

वह शौपेनहावर की कुतिया तक गया
और पुछा, 'आत्मा (1) कौन है?'
शौपेनहावर मौन है।
चीखता है अहूरमज़्दा (2)
की ईश्वर एक मौन है।

आँखों में उतर आये
मोतियाबिंद की पारभासक रोशनी में
पूछता है वह मोहम्मद से
नन्नार की पहाड़ियों पर
अल्लाह कौन है?
मोहम्मद मौन है।

स्टीफेन हाकिंग की
इलेक्ट्रो-यांत्रिक आवाज़ में
फुसफुसाता है तब डार्विन
कि ईश्वर एक वायरस (3) है।

प्रतिकुल परिस्थितियों में मृत पड़ा ईश्वर
वायरस की तरह
अचानक ही सक्रिय हो उठता है
हमारी शिराओं के खून की अनुकुलता में।

वक्र हँसी हँसता है मिखाइल गोर्ब्याचोव।
"ईश्वर के ताबूत में
ठोके गए उसके आखिरी कील को
निकाला किसने"–पूछता है नीत्शे।

और उसके पैंतालिस वर्षों बाद
दुनिया को बदल देने की ग्लासनोत्सी अवधारणाओं में कैद
एक पूर्व कम्युनिस्ट
ईश्वर को निकालता है ताबूत से
और वायरस की भाँति
छोड़ देता है मिडिल-ईस्ट में।

किसी भी किस्म की सत्ता द्वारा स्थापित
जीवन एवं ज़िंदगी की अनिश्चितता और
मृत्यु की अनिवार्यता के बीच
ज़िंदा है और रहेगा ईश्वर।




सन्दर्भ
(1) शॉपेनहावर ने अपनी पालतु कुतिया का नाम 'आत्मा' रखा था, यहाँ वही संदर्भित है।
(2) अहूरमज़्दा-चौथी-पाँचवीं शताब्दी पूर्व बेहिस्तून अभिलेख में उद्धृत जोरोस्ट्रियनिज़्म धर्म में अवेस्ता भाषा में ईश्वर या creator का नाम।
(3) जीवित और मृत के बीच की कड़ी है वाइरस। प्रतिकूल परिस्थिति में यह सालों मृत पड़ा रहता है किन्तु अनुकूल परिस्थिति के मिलते ही यह हज़ार वर्षों के बाद भी तुरंत जीवित हो उठता है।