भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए
लोक संगीत
कविता कोश विशेष क्यों है?
कविता कोश परिवार

विद्यापति सें / कनक लाल चौधरी ‘कणीक’

Kavita Kosh से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

हे कोकिल-कंठ!
आबेॅ तोरा बताबेॅ पड़थौं
अंगोॅ आरो मिथिला के बुझाबेॅ पड़थौं
कि तोहें केकरोॅ?
तोरोॅ जत्ते गीत छै-गान छै-कविता छै
दोन्हूं समान रूपोॅ में अपनैने छौं
तोरोॅ रचना ठो-
जौने भी आपनोॅ आपनोॅ नजरिया सें देखै छै
आपने रङ लागै छै
जे रङ कबीरोॅ रोॅ रचना
हिन्दुहाँ आरो मुसलमान्हाँ अपनैलकै
दोन्हू कबीरोॅ केॅ आपनोॅ आपनोॅ बतैलकै
आरो फेनू जे मरल्हौ पर फूल बनी गेलै
तेॅ बटबारा करी केॅ
कोय मसानी में जलैलकै- कोय कबड्है में गाड़लकै
मतर हे विद्यापति!
तोरा ते एक्है सम्प्रदाय बालां आपनोॅ आपनोॅ
-बोली सें नापै लेॅ चाहै छौं,
है बात सच्च छै-कि तोहें-
मिथिला में राजसी सम्मान पैल्हौ
मतर तोरोॅ जनम आरो करमभूमी तेॅ अंगे धरती छेल्हौं
होना केॅ मैथिली भाषीं भल्लें-
गंगा के सौसे उत्तरी भागोॅ पर दाबा ठोकेॅ
मतर हौ बात सच्च तेॅ नाँय छै?-
होना केॅ है भूमि हजार साल तालुक साहित्य लेली
तरसथैं रहलै-मतर बोली तेॅ बरकरारे छेलै?
तखनी जबेॅ हौ दाबा खारीज भेलै तेॅ
आबेॅ तेॅ आपनोॅ अंगिका माय घोॅर लौटी चुकलीत
-से हे महान शिवभक्त! उगना पति!!
तोरोॅ उगना तेॅ हेराय कॅ अंधैं में भटकै छौं
आबी के खोज्हौ-हुनी साक्षात शिवे जीं
तोरा नैं बतैनै छौं? कि तोरोॅ जनम-मरण
जवेॅ यही माँटी में भेलै-तोर्है टेरोॅ पर
जबेॅ गंगा माँय आवी केॅ याँही सत्गति देलखौं
तेॅ फेनू गरजी-गरजी केॅ दुनियाँ केॅ कैन्हेनी
बताबै छी? कि हम्में अंधै के छिकां!
आरो हमरोॅ गीत-कविता सभ अंधैं वासी
बास्तें लिखलोॅ गेलोॅ छै।
हों तोरा रचना सें जों दोसरेॅ तेसरें लाभ
उठावेॅ तेॅ भल्ले बात छै नी?