भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए
लोक संगीत
कविता कोश विशेष क्यों है?
कविता कोश परिवार

विनयावली / तुलसीदास / पद 71 से 80 तक / पृष्ठ 3

Kavita Kosh से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

पद 75 से 76 तक

(75),

 
खोटो खरो रावरो सौं, रसरेसों झूठ क्यों कहौंगो,
जानो सब ही के मनकी।
करम-बचन-हिये, कहौं न कपट किये , ऐसी हठ जैसी गाँठि ,
पानी परे सनकी।1।
 
दूसरो, भरोसो नाहिं बासना उपासनाकी, बासव , बिरंचि,
 सुर-नर-मुनिगनकी।
स्वारथ के साथी मेरे, हाथी स्वान लेवा देई , काहू तो न पीर ,
 रघुबीर!दीन जनकी।2।

साँप-सभा साबर लबार भये देव दिब्य, दुसह साँसति कीजै,
 आगे ही या तनकी।
साँचे परौं , पाऊँ पान, पंचमें पन प्रमान, तुलसी चातक आस,
 राम स्यामघनकी।3।


(76)

खेाटेा खरो रावरो हौं, रावरी सौं, रावरेसों झूठ क्यों कहौंगो,
जानो सब ही के मनकी।

करम-बचन-हिये, कहौं न कपट किये, ऐसी हठ जैसी गाँठि,
पानी परे सनकी।।

दूसरो , भरोसो नहिं बासना उपासनाकी, बासव, बिरंचि,
सुर-नर-मुनिगनकी।।

स्वारथके साथी मेरे, हाथी स्वान लेवा देई, काहू तो न पीर,
रघुबीर!दीन जनकी।।
 
साँप-सभा साबर लबार भये देव दिब्य, दुसह साँसति कीजै,
आगे ही या तनकी।

साँचे परौं, पाऊँ पान, पंचमें पन प्रमान,तुलसी चातक आस
राम स्यामघन की।।