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विनयावली / तुलसीदास / पद 81 से 90 तक / पृष्ठ 5

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पद संख्या 89 तथा 90

(89)
मेरो मन हरजू! हठ न तजै।
निसदिन नाथ देउँ सिख बहु बिधि, करत सुभाउ निजै।1।

ज्यों जुवती अनुभवति प्रसव अति दारून दुख उपजै।
 ह्वै अनुकूल बिसारि सूल सठ पुनि खल पतिहिं भजै।2।
 
लोलुप भ्रम गृहपसु ज्यों जहँ तहँ सिर पदत्रान बजै।
 तदपि अधम बिचरत तेहिं मारग कबहुँ न मूढ़ लजै।3।

 हौं हार्यो करि जतन बिबिध बिधि अतिसै प्रबल अजै।
तुलसिदास बस होइ तबहिं जब प्रेरक प्रभु बरजै।4।

( 90)
ऐसी मूढ़ता या मनकी।
परिहरि राम-भगति -सुरसरिता, आस करत ओसकनकी।1।

धूम-समूह निरखि चातक ज्यों , तृषित जानि मति घनकी।
नहिं तहँ सीतलता न बारि, पुनि हानि होति लोचनकी।2।

ज्यों गच-काँच बिलोकि सेन जड़ छाँह आपने तनकी।
 टूटत अति आतुर अहार बस, छति बिसारि आननकी।3।

 कहँ लौं कहौं कुचाल कृपानिधि! जानत हौं गति जनकी।
तुलसिदास प्रभु हरहु दुसह दुख, करहु लाज निज पनकी।4।