भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए
लोक संगीत
कविता कोश विशेष क्यों है?
कविता कोश परिवार

विनयावली / तुलसीदास / पद 91 से 100 तक / पृष्ठ 3

Kavita Kosh से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

पद 95 से 96 तक

(95)

तऊ न मेरे अघ-अवगुन गनिहैं।
जौ जमराज काज सब परिहरि, इहै ख्याल उर अनिहैं।1।

चलिहैं छूटि पुंज पापिनके, असमंजस जिय जनिहैं।
देखि खलल अधिकार प्रभूसों (मेरी) भूरि भलाई भनिहैं।2।

 हँसि करिहैं परतीति भगतकी, भगत-सिरोमनि मनिहैं।
ज्यों त्यों तुलसिदास कोसलपति अपनायेहि पर बनिहैं।3।

 (96)

जौ पै जिय धरिहौं अवगुन जनके।
तौ क्यों कटत सुकृत -नखते मो पैं, बिपुल बृंद अघ-बनके।1।

कहिहै कौन कलुष मेरे कृत, करम बचन अरू मनके।
हारहिं अमित सेष सारद श्रुति, गिनत एक एक छनके।2।

जो चित चढैं़ नाम-महिमा निज, गुनगन पावक पनके।
तो तुलसिहिं तारिहौं बिप्र ज्यों दसन तोरि जमगनके।3।