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विभा कौल / स्वप्निल श्रीवास्तव

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उस लड़की के लिए जिसका नाम विभा कौल नहीं है

श्रीनगर से दिल्ली की कठिन
यात्रा में बहुत रोई होंगी विभा कौल
अपना घर, नदी, पहाड़, जंगल
अचानक एक हादसे में छोड़ आना
उनके लिए त्रासद अनुभव है

रास्ते भर पीछे मुड़कर देखने की
आदत अभी नहीं छूटी है
शायद दूर से दिख जाए
अपना छूटा हुआ घर

डल झील के मटमैले रंग में
ठिठके हुए शिकारे की परछाईं
उनकी आँखों में काँपती है

बीच-बीच में गोली की आवाज़ से
चिंहुक उठती हैं विभा कौल

उन्हें बगीचे में सेब का गिरना
घटना की तरह याद आता है

वे अब नहीं देख पाएँगी
आँगन में लगे गुलमोहर के
पहले फूल
वहाँ के वसन्त-पतझड़

बचपन के पहाड़ों की बारिश, उससे
उठती हुए सोंधी महक उन्हें भूलनी होगी
क्या यह आसन होगा विभा कौल
के लिए


विभा कौल के साथ बहुत-सी हैं
विभा कौल
वे ठण्ड के डर से पहाड़ से मैदान
में बलात उतर आई चिड़ियाएँ
नहीं हैं, जो मौसम के सामान्य
होने पर वापिस लौट जाएँ.

घोसला बनाने के पहले
तिनके-तिनके हो गई विभा कौल
उन्हें करूण प्रसंग की तरह याद
करने से अच्छा है उन्हें अपने
सपनो में जगह दी जाए

ऐसा नहीं था उनका शहर
लोगों के हांथों में फूलों के गुच्छे
और चेहरों पर उत्फुल्लता थी

आज कन्धों पर बन्दूकें
और आँखों में
बेशुमार गुस्सा है
बाररूद के धुएँ में भर गई है
घाटी
सेब खाते हुए भय लगता है
कहीं उसमें बारूद न भरी हो

कैसे आतताई शहर में आ गए हैं
वे लोगों को परिन्दों की तरह
मार रहे हैं

चीड़ के वन में गुज़रती है
साँय-साँय करती हवाएँ
बर्फ़ीले मौसम में मुश्किल से
सड़क पार कर पाती है लड़की

नदियों पहाड़ों के प्रसंग
गोली से मारे गए लोगों की
दुखद सूचनाओं से भर गए हैं

विभा कौल के पास कश्मीर के ख़ुशगवार
और चमकीले दिनों की यादें हैं
उनकी तरह सफ़ेद बादलों की छाँह में
वह आपने अकेलेपन के साथ भीगती है

दिल्ली की भीड़-भाड़ भरी सड़कों पर
उन्हें चलते हुए देखिए
उनकी निस्संगता हतप्रभ करने
वाली होती है

जिसने सहा होगा अपनी ज़मीन से
बेदखल होने का दुःख वही
विभा कौल के मर्म को समझ
सकता है,
लेकिन यहाँ ज़मीन पर कौन है!