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विरह / लीलानन्द कोटनाला

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आयो चैतर मास, सुणा दौं मेरी ले सास
वण-वणूडें[1] सबी मौली[2] गैन, चीटें[3] मौली गैन घास
स्वामी मेरो परदेस गै तो, द्वी तीन होई गैन मास
अज्यूं[4] तई[5] कुछ सुणी[6] नि-मणी, ज्यूं[7] को ह्वेगे उत्पास[8]
जौंका स्वामी घरू छन, तौंको होयुं छ विलास
रंग-विरंगे चादरे ओढ़ी-ओढ़ी, अड़ोस-पड़ौस सुहास।

शब्दार्थ
  1. वनस्पतियाँ
  2. हरी भरी हो गयीं
  3. पहाड़ी
  4. अभी
  5. तक
  6. कुछ पता लगना
  7. प्राण
  8. उदास