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विलुप्त होते किसान (केरल के गाँवों में) / सजीव सारथी

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गाँव अब नही रहे,
प्रेमचंद की कहानियों वाले,
बैलों का जोडा -हीरा मोती,
अब नही दिखते कहीं -
वर्षा की बाट देखते,
जुम्मन और होरी,

अब वो कम ही जाते हैं,
ईट की भट्टियों की तरफ़,
जहाँ खेत थे उनके कभी,

भाडे के ठेकेदारों के,
बेरहम मजदूरों ने,
नोंच लीं हैं-
हरियालियाँ सभी,
खेत अब क्या हैं -
जमीन का एक टुकडा बस,
जो काम आ जाएगा,
बिटिया की शादी में,
या किसी बुरे वक्त में,

किसी तरह पेट पाला,
लिखा-पढ़ा दिया बच्चों को,
अब कोई दिल्ली, कोई मुम्बई,
तो कोई साउदी से भेज देता है,
बैंक की किश्त,
और जरुरी खर्च,

आराम कुर्सी पर
बूढी पीठ टिका कर,
पढ़ लेते हैं अब वो,
दुनिया भर की ख़बरों का अखबार,
खाध्य संकट पर हो रहा है विचार,
विकासशील देशों की खपत से,
चिंतित है अमेरिका...
होता रहे, उन्हें क्या...

सभ्यता के विकास में अक्सर,
विलुप्त हो जाती हैं-
हाशिये पर पड़ी प्रजातियाँ,

विलुप्त हो रहे हैं हल जोतते,
जुम्मन और होरी आज –
मेरे गाँव में -
विलुप्त हो रहा हैं - किसान