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अपन जान मैं बहुत करी / सूरदास

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कवि: [[{{KKGlobal}}{{KKRachna|रचनाकार=सूरदास]]}}[[Category:कविताएँपद]][[Category:सूरदास]]राग सारंग
राग बिलावल<poem>आछो गात अकारथ गार्‌यो।करी न प्रीति कमललोचन सों, जनम जनम ज्यों हार्‌यो॥निसदिन विषय बिलासिन बिलसत फूटि गईं तुअ चार्‌यो।अब लाग्यो पछितान पाय दुख दीन दई कौ मार्‌यो॥कामी कृपन कुचील कुदरसन, को न कृपा करि तार्‌यो।तातें कहत दयालु देव पुनि, काहै सूर बिसार्‌यो॥</poem>
भावार्थ :- `जनम....हार्‌यो' = प्रत्येक जन्म में व्यर्थ ही सुन्दर शरीर नष्ट कर दिया।
नर शरीर पाकर भी हरि का भजन करते न बना। जिस शरीर को `मोक्ष का द्वार' कहा है,
उसे भी विषय-भोगों में नष्ट कर दिया। पर भक्त को प्रभु की कृपा का अब भी भरोसा
है। हरि की कृपा ने बड़े-बड़े कामी, कृपण, मलिन और कुरूपों को भव-सागर से तार
दिया। लेकिन सूर को तो इस नियम में भी अपवाद प्रतीत होता है। न जाने, उस दयालु ने
सूर को क्यों बिसरा दिया !
चरन कमल बंदौ हरि राई।जाकी कृपा पंगु गिरि लंघै, आंधर कों सब कछु दरसाई॥बहिरो सुनै, मूक पुनि बोलै, रंक चले सिर छत्र धराई।सूरदास स्वामी करुनामय, बार-बार बंदौं तेहि पाई॥ भावार्थ शब्दार्थ :-- जिस पर श्रीहरि की कृपा हो जाती हैआछो = अच्छा, उसके लिए असंभव भी संभव हो जाता है। लूला-लंगड़ा मनुष्य पर्वत को भी लांघ जाता है। अंधे को गुप्त और प्रकट सबकुछ देखने की शक्ति प्राप्त हो जाती है। बहरा सुनने लगता है। गूंगा बोलने लगता है कंगाल राज-छत्र धारण सुन्दर। गात =शरीर। अकारथ = व्यर्थ। गार्‌यो =बरबाद कर लेता हे। ऐसे करूणामय प्रभु की पद-वन्दना कौन अभागा न करेगा। शब्दार्थ :-राईदिया। ज्यो = राजा। पंगु जीव। तुअ = लंगड़ा। लघै तेरी। चार्‌यो =लांघ जाता हैचारों नेत्र, पार कर जाता है। दो बाहर के नेत्र और दो मूक भीतर के ज्ञान नेत्र। दई =गूंगा। रंक दुर्दैव, दुर्भाग्य। कृपन =निर्धनलोभी, गरीबघृणित। कुचील =मैला, कंगाल। छत्र धराई = राज-छत्र धारण करके।तेहि = तिनके। पाई गंदा। कुदरसन =चरण।कुरूप।
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