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|रचनाकार=घनश्यामचन्द्र घनश्याम चन्द्र गुप्त
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तुम असीम, मैं क्षुद्र बिन्दु सा, तुम चिरजीवी, मैं क्षणभंगुर
तुम अनन्त हो, मैं सीमित हूंहूँ, वट समान तुम, मैं नव अंकुर
तुम अगाध गंभीर सिन्धु हो, मैं चँचल सी नन्हीं धारा
तुम में विलय कोटि दिनकर, मैं टिमटिम जलता-बुझता तारा
सृजन तुम्हारा, सृष्टि तुम्हारी, मेरी तो भूमिका मात्र है
भृकुटि-विलास तुम्हारा करता सृजन-विलय सम्पूर्ण सृष्टि का
बन चकोर मेरा मन रहता अभिलाषी दो बूँद वृष्टि का
मेरे लिये स्वयं से हट कर क्षण भर का चिन्तन भी भारी
तुम शरणागत वत्सल परहित-हेतु हुए गोवर्धनधारी
व्याकुल प्राण-रहित वँशी वंशी में तुमने फूंका मन्त्र फूँका मंत्र मात्र हैराग तुम्हारा, ताल तुम्हारी, मेरा तो बस यन्त्र यंत्र मात्र है</poem>
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