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आस जैसे सीढ़ियों पे बैठ जाए थक पुजारिन
और मंदिर में रहें रहे ज्यों देव का श्रृंगार बासी
बिजलियाँ बन कर गिरें दुस्वप्न उस ही शाख पे बस
घोंसला जिस पे बना बैठी हो मेरी पीर प्यासी !
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