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उनके पश्चात् / कुंवर नारायण

No change in size, 20:35, 4 नवम्बर 2009
|रचनाकार=कुंवर नारायण
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कुछ घटता चला जाता है मुझमें
 
उनके न रहने से जो थे मेरे साथ
 
 
मैं क्या कह सकता हूँ उनके बारे में, अब
 
कुछ भी कहना एक धीमी मौत सहना है।
 
 
हे दयालु अकस्मात्
 
ये मेरे दिन हैं ?
 
या उनकी रात ?
 
 
मैं हूँ कि मेरी जगह कोई और
 
कर रहा उनके किये धरे पर ग़ौर ?
 
मैं और मेरी दुनिया, जैसे
 
कुछ बचा रह गया हो उनका ही
 
उनके पश्चात्
 
 
ऐसा क्या हो सकता है
 
उनका कृतित्व-
 
उनका अमरत्व -
 
उनका मनुष्यत्व-
 
ऐसा कुछ सान्त्वनीय ऐसा कुछ अर्थवान
 
जो न हो केवल एक देह का अवसान ?
 
 
ऐसा क्या कहा जा सकता है
 
किसी के बारे में
 
जिसमें न हो उसके न-होने की याद ?
 
 
सौ साल बाद
 
परस्पर सहयोग से प्रकाशित एक स्मारिका,
 
पारंपरिक सौजन्य से आयोजित एक शोकसभा :
 
 
किसी पुस्तक की पीठ पर
 
एक विवर्ण मुखाकृति
 
विज्ञापित
 
एक अविश्वसनीय मुस्कान !
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