भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए

Changes

Kavita Kosh से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज
[[Category: दोहा]]
<poem>
कड़कै वीज कुलच्छणी गाजै घण गंभीर ।
वाजै झीणो वायरो भाजै विरहण-धीर ।।51।।
कुलक्ष्णी बिजली कड़क रही है, घन गर्जन कर रहे है, मन्द पवन बह रहा है और विरहणी का धैर्य छूट रहा है ।
कड़कै वीज कुलच्छणी गाजै घण गंभीर।गाज न समझूं, बादळी मतना पळका मार ।वाजै झीणो वायरो भाजै विरहण-धीर।। 51 ।।बूंदां लिखदे बांच लूं साजन रा समचार ।।52।।
कुलक्क्षणी बिजली कड़क रही है, घन गर्जन कर रहे हैबादली, मन्द पवन बह रहा मैं तेरी गरज नही समझती । तेरा यह चमकना भी व्यर्थ है और विरहणी का धैर्य छूट रहा है।। बूंदों के रूप में साजन के समाचार लिख दे जिन्हें मैं पढ़ लूँ ।
गाज न समझूं, बादळी मतना पळका मार।आभो धररायो अबै आयो सावण मास ।बूंदां लिखदे बांच लूं साजन रा समचार।। 52।।पूरै मन सूं पूरसी आज धरा री आस ।।53।।
बादलीआकाश थर्रा रहा है, मैं तेरी गरज नही समझती। तेरा अब सावन का महीना आ गया है । आज पूरे मद से यह चमकना भी व्यर्थ है। बूंदों के रूप में साजन के समाचार लिख दे जिन्हें मैं पढ़लूं।धरा की आशा पूर्ण करेगा ।
आभो धररायो अबै आयो सावण मास।छावण लागी बादळी, हिवडै उमड्यो नेह ।पूरै मन सूं पूरसी आज धरा री आस।। 53।।तरसण लागी तीजणी फड़कण लागी देह ।।54।।
आकाश धर्रा रहा बादलियाँ छाने लगी हैं और हृदय में स्नेह उमड़-उमड़ आया है, अब सावन का महीना आ गया है। आज पूरे मद से यह धरा की आशा पूर्ण करेगा।तीजनियाँ तरसने लगी हैं और उनकी देह फड़कने लगी है ।
छावण लागी बादळी, हिवडै उमड्यो नेह।ऊचां डाला मांडियां हींडा तकड़ी डोर ।तरसण लागी तीजणी फड़कण लागी देह।। 54।।हींडै ऊभी तीजण्यां कर-कर पूरो जोर ।।55।।
बादलियां छाने लगी ऊँची डालों पर मज़बूत डोरियों से झूले डाले गए है और हृदय में स्नेह उमड़तीजनियाँ खड़ी-उमड़ आया है, तीजनियां तरसने लगी है और उनकी देह फड़कने लगी है।खड़ी पूरे ज़ोर से झूल रही हैं ।
ऊचां डाला मांडियां हींडा तकड़ी डोर।हींडै ऊभी तकड़ै हींडां तीजण्यां करजावै लाग अकास ।बादळियां सामी मिलै, भर-कर पूरो जोर।। 55।।भर हियै हुळास ।।56।।
ऊंचे डालों मज़बूत झूलों पर मजबूत डोरियों से झुले डाले गये है औरर तीजनीयां खड़ीझूलती हुई तीजनियाँ आकाश को छू लेती हैं और सामने बादलियाँ हृदय में हुलास भर-खड़ी पुरे जोर से झुल रही है।भर उनसे मिलती हैं।
तकड़ै हींडां रळमिळ चाली तीजण्यां जावै लाग अकास।गाती राग मल्हार ।बादळियां सामी मिलै, भर-भर हियै हुळास।। 56।।भणक पड़ी जद बादळी बरस पड़ी उण वार ।।57।।
मजबुत झुलों पर झुलती तीजनियाँ हिल-मिल कर मल्हार राग गाती हुई तीजनींया आकाष को छू लेती है और सामने बादलिंया हृदय चलीं। बादली के कानों में हुलास भर-भर उनसे मिलती है।यह भनक पड़ते ही वह उसी समय बरस पड़ी ।
रळमिळ चाली तीजण्यां गाती राग मल्हार।बाजै धीमो बायरो आभो लोरां-लोर ।भणक पड़ी जद बादळी बरस पड़ी उण वार।। 57।।छिणमण-छिणमण छांटडी हिवडै़ उठै हिलोर ।।58।।
तीजनियां हिलमंद पवन चल रहा है, आकाश में लोर पर लोर छा रहे है, छोटी-मिल कर मल्हार राग गाती हुई चली। बादली के कानों छोटी बूँदें पड़ रही हैं और हृदय में यह भनक पड़ते ही वह उसी समय बरस पड़ी।हिलोरे उठ रही हैं ।
बाजै धीमो बायरो आभो लोरां-लोर।नभ सूं उतरी बादळी ज्यूं वेर्यां पणिहार ।छिणमण-छिणमण छांटडी हिवडै़ उठै हिलोर।। 58।।साजन सामा आविया उळझ पड़ी उण वार ।।59।।
मंद पवन चल रहा है, बादली आकाश में लोर से पनिहारी का रूप लेकर पृथ्वी पर लोर छा रहे है, छोटी-छोटी बूंदें पड़ उतरती हुई प्रतीत हो रही है। साजन के सामने आने पर उनसे उलझ रही है और हृदय में हिलोरे उठ रही है।
नभ सूं उतरी बरसण आयी बादळी ज्यूं वेर्यां पणिहार।नैणां आयो नीर ।साजन सामा आविया उळझ पड़ी उण वार।। 59 ।।धण किण विध अब धारसी देख धरा मन धीर ।।60।।
बादली आकाश से पनिहारी का रूप लेकर पृथ्वी पर उतरती हुई प्रतित हो रही है। साजन के सामने आने पर उनसे उलझ रही है। बरसण आयी बादळी नैणां आयो नीर।धण किण विध अब धारसी देख धरा मन धीर।। 60।। बादली बरसने आयी आई है और आंखों आँखों में नीर भर आया है। है । धरा के मन में धैर्य देख कर धन्या अब किस प्रकार धैर्य धारण करेगी।करेगी ।</poem>
Delete, Mover, Protect, Reupload, Uploader
49,477
edits