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विस्थापन / स्वप्निल श्रीवास्तव

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जो गाँव में रहते है वे शहर में
जाने के लिए बेचैन है
शहर के नागरिक महानगर में
बसने के लिए हैं लालायित

छोटी जगह कोई नहीं रहना चाहता
सबको चाहिए बड़ी जगह

ज़मीन पर रहने के लिए कोई
राजी नहीं है
सबको चाहिए आसमान और उड़ने
के लिए पँख

उनके जाने से जो जगह रह जाती है
उस जगह को डबडबाई आँखो से
देखते है माता–पिता
अवरूद्ध हो जाते है उनके कण्ठ

राजधानियाँ कुछ खास राजनेताओं, कवियों, लेखकों
दलालों, उठाईगीरों के लिए आरक्षित है
उनकी प्रतीक्षा सूची लम्बी है

बड़े कवि छोटे शहरों में नहीं रहते
उनका वहाँ दम घुटता है
छोटे शहरों में प्रसिद्धि के अवसर
नहीं हैं

जो महत्वाकाँक्षाओं के लिए चुनते हैं विस्थापन
वे महानता के पथ पर आगे बढ़ते हैं
वे सहज जीवन नहीं वर्जित इच्छाओं का
चुनाव करते हैं