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विहागरा / शब्द प्रकाश / धरनीदास

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99.

जगमेँ जीवन दिन चारि।टेक।
वेगिहिँ चेति भजो हरिनामहि, कपट को पट फारि॥
प्रथम वयसहिँ खेलि हारे दुतिय दर्द विसारि।
ततिय धनि सुत वित विषय रस पिवत वदन पसारि॥
चौथे दिन सोचत सिरानो, सको नहि निरुवारि।
मनु जन्म महा पदारथ, चले जूवा हारि॥
रोम रोम अधीन तेहिको, करत मन मतुहारि।
दास धानी श्रन आयो, लोक लाज निवारि॥3॥

100.

मन रे तजु कपट अभिमान।टेक।
जीव समुझि परबोधहु हो, भैया मति जानहु खेलवाड।
जा दिन लेखवा पसरिहै हो, भैया करबहु कवनि उपाय॥
मंत्र सिरवाय कवन सिधिहो, भैया यंत्र युक्ति नहि काम।
नहि षट कर्म कटि हो, भैया अवर करम लपटाय॥
यहि विश्वास बिगुरवन हो, भैया देव दिहल दहिनाय।
धरनी जन गुन गावल हो, भैया भजि लेहु आतम राम॥4॥

101.

सन्तो मोहि कहो समुझाय।टेक।
कौन विधा में वरनो हो।
जो प्रभु अगम अगोचरा, जाकि महिमा अगम अपार॥
सप्त पताल चरन रहे, जाको शीश[1] सप्त अकाश।
भुवन चोदस उर वसै, जेहि वेद जान न भेद॥
ब्रह्मा वेणु बजावही, जेहि नाच मगन महेश।
धरनि चरन श्रन गती, जेहियुन एकहि राज॥5॥

102.

हे ब्राह्मण विनती एक मोरी, सुनहु श्रवन चित लाय।टेक।
जाहि ब्रहमते ब्राह्मण उपजो, सोई ब्रह्म सब माँहि।
जव लगि एक ब्रह्म नहि जानो, तब लगि ब्राह्मन नाहि॥
वेद बड़ा है गोत्र तुम्हारा, सो पुनि करत पुकार।
जीभ स्वाद लगि जीवन मारो, जियहु न वर्ष हजार॥
पशु पंछी जल जंतु न छोड़ो, छोड़ो, कैसे गाय।
पोथी पत्रा गीता देखो, मोहि कहो समुझाय॥
धरनी मान अजहुँ जनि पाँडे, लोक नदी भठियाहु।
तजि वैकुंठ ब्रह्मपुर वासा, नरट अगति कत जाहु॥6॥

103.

मीयाँ मोलना समुझी देखो, को है बोलनि हारा।टेक।
बिना दया दस्तार जो बाँधो, जानि धरो शिर भारा।
शिरपर छाँइ खीस नहिँ मेटै, कैसे मिटत खुमारा।
शिर समला पैराहन पहिरो, साँच नहीं ठहराई।
दस दिसि दिल दुनिया को दौरै, कैसे मिलत खोदाई॥
बगल कितेब जेब दिखरावै, छुरी जारबँद लाई।
गल काटते दर्द न आवै, मसला पढ़त बनाई॥
धरनी बाँग बुलन्द पुकारै, अजहुँ न समझै पारा।
छोड़ि बुजुर्गी गरीबी, तब पहुँचे दर्बारा॥7॥

104.

रमैया राम भजि लेहुला जाते जनम मरन कटि जाय।टेक।
शहर बसै एक चौहट, एक हाट परवाना।
ताहि हाट को वानिया, वनिज न भाव आन॥
तीन तले एक ऊपरे, बीच बहै दरियाव।
कोइ कोइ गुरु गम ऊतरे, सुरत सरीखी नाव॥
तीन लोक तिनि देवता, सो जानै नर लोय।
चौथे पद परिचय भयो, सो जन विरला कोय॥
सो योगी सो पंडिता, सो वैरागी राव।
जो यहि पदहिँ विलोइया, धरनी धरु ता पाव॥8॥

105.

भगत जन धनि धनि, धनि जेहि कुल अवतार।टेक।
जा तन माला तिलक विराजै, अरु छापा छवि देत।
विश्वंभर विश्वास हृदयमें, संगति साधु समेत॥
पर-निंदा जेहि सुन न भावै, पर धन छार समान।
पर-नारी पर-सम्पति त्यागे, साँच शब्द परमान॥
जिय-पालकहि कहावै वैष्णव, प्रगट यही संसार।
आत्मघाति साकहा होवे, जेहि न विवेक विचार॥
धरनी मन वच क्रम पग वंदै, जो जन ऐसा होय।
ता घर प्रगट बसै अविनाशी, और कहै मति कोय॥9॥

106.

जगत तज सुनि लेउ, जाके वेद विमल यश गाव।टेक।
हरि भक्ता को मस्तक नावै, कर जोरे कहि राम।
ता खन ताको विधिन विनासै, जाड़ हरै जस धाम॥
हरिनामी के सुख देवेसे, सुखिया सब संसार।
हरिजन के मन को कलपावे, तेहि कलपै कर्त्तार॥
रामभक्त को चरन प्रछालौ, ले चरनामृत पाव।
निश्चय सकल तिरथ फल पावै, अंत डरै यम राव।
त्रेता रघुपति यदुपति द्वापर, कलि संतन को देह।
धरनी यहि परतीति जाहि भौ, तेहि चरनन की खेह॥10॥

  1. मस्तक