भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए
लोक संगीत
कविता कोश विशेष क्यों है?
कविता कोश परिवार

वो कहती है / अनुपम कुमार

Kavita Kosh से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

वो कहती है
तो सच ही होगा
जीवन पैसे बिन बेकार
मैं कहता हूँ
सच नहीं ये क्या
जीवन ही है निस्सार

वो कहती है
तो सच ही होगा
करना न आया तुमको प्यार
मैं कहता हूँ
सच नहीं ये क्या
करता हूँ दुनिया से प्यार

वो कहती है
तो सच ही होगा
समय करता अत्याचार
मैं कहता हूँ
सच नहीं ये क्या
जीवन का ही ये आचार

वो कहती है
तो सच ही होगा
खाते नहीं मेरे दो चार
मैं कहता हूँ
सच नहीं ये क्या
घन का साथी भ्रष्टाचार

वो कहती है
तो सच ही होगा
लेता नहीं मैं कभी उधार
मैं कहता हूँ
सच नहीं ये क्या
जीवन भी है एक उधार

वो कहती है
तो सच ही होगा
भवसागर हों कैसे पार
मैं कहता हूँ
सच नहीं ये क्या
प्रभु करेंगे नौका पार

वो कहती है
तो सच ही होगा
बना न सके घर दरबार
मैं कहता हूँ
सच नहीं ये क्या
तन के भी हम किरायेदार

वो कहती है
तो सच ही होगा
कितने तुम हो अभी लाचार
मैं कहता हूँ
सच नहीं ये क्या
देख रहे सब पालनहार

वो कहती है
तो सच ही होगा
जीवन में हैं ख़ार ही ख़ार
मैं कहता हूँ
सच नहीं ये क्या
जीवन होगा फिर गुलज़ार

वो कहती है
तो सच ही होगा
कब मनाया था त्यौहार
मैं कहता हूँ
सच नहीं ये क्या
हर दिन ही तो है त्यौहार

वो कहती है
तो सच ही होगा
बढ़ने लगी हममें तकरार
मैं कहता हूँ
सच नहीं ये क्या
ऐसे ही बढ़ता है प्यार