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वो कीचक बोलै बोल-कु-बोल, मखौल बणादे जात थारी / ललित कुमार

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वो कीचक बोलै बोल-कु-बोल, मखौल बणादे जात थारी,
लाज बचाकै आई आज मै, आत्मा बहोत घंणी दुःख पारी || टेक ||

भाज दौड़ कै आई मै, वो पाछै-पाछै आ लेगा,
फेर बता के करल्योगे, जब वो बहूँ बणा लेगा,
बण पुलोमासुर ठा लेगा, वा पुलोमा नारी,
इसे पांच पतियाँ तै आच्छी तो, मै रह जाती कँवारी ||

इब फेर तमाशा देखोगे, थाम मेरे उतरते चीर का,
कौनसा भार ओट लेगा, मेरे खुल्ले केश सिर का,
यो धर्म बिगड़ज्या सती बीर का, न्यूं बणे फिरो बलकारी,
रणभूमि मै जाण पाटज्या, थाम जुये के बड़े खिलारी ||

भाई के भवन मै दई भेज रात नै, उस सुदेष्णा नारी नै,
सती बीर का सत तुड़वाणा चाहया, उस पाप कमाणी नै,
सोची कोन्या मरजाणी नै, जुल्म करे बड़े भारी,
धक्का करके भेज दई, मेरी गेल बणी लाचारी ||

ललित बुवाणी आला भाई, यो भेद बतारया सारा,
चौखट जंगले जोड़ी घडता, चाले जा सै आरा,
यो मेहनत करकै करै गुजारा, ना करता चोरी-जारी,
वो त्रिलोक का नाथ बेरा ना, कद काटै मेरी बीमारी ||