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वो कौन दिल है जहाँ जलवा-गर वो नूर नहीं / इनामुल्लाह ख़ाँ यक़ीन

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वो कौन दिल है जहाँ जलवा-गर वो नूर नहीं
उस आफ़ताब का किस ज़र्रे में ज़ुहूर नहीं

कोई शिताब ख़बर लो कि बे नमक है बहार
चमन के बीच दीवानों का अब के शूर नहीं

तजल्लियों से पहुँचता है कब उसे आसेब
सनम-कदा है न आख़िर ये कोह-ए-तूर नहीं

तेरे सफ़र की ख़बर सुन के जान धड़कों से
जो पहुँचूँ मर्ग के नज़दीक मैं तो दूर नहीं

कोई भी देता है लड़कों के हाथ शीशा-ए-दिल
‘यक़ीं’ मैं ग़ौर से देखा तो कुछ शऊर नहीं