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वो निहाई / रुडयार्ड किपलिंग / तरुण त्रिपाठी / तरुण त्रिपाठी

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{..यह कविता 1066 ईस्वी में हुई इंग्लैंड पर नॉर्मन्स के विजय पर है, जब से इंग्लैंड की एक देश के रूप में यूरोप की बड़ी शक्ति होने की शुरुआत हुई..}

इंग्लैंड निहाई पर है– सुनो ये हथौड़े की धमक– झनझना रही है जो सेवर्न से टाइन तक!
नहीं हुआ कोई लोहार कभी पहले हमारे नॉर्मन के राजा की तरह-
इंग्लैंड तराशा जा रहा है, गढ़ा जा रहा है, ढाला जा रहा है एक लकीर पर

इंग्लैंड निहाई पर है! तीक्ष्ण हैं प्रहार!
(पर काम एक करिश्मा साबित होगा जब हो जाएगा)
छोटे-छोटे राज्य नहीं टिक पाएँगे अपने शत्रुओं के विरुद्ध
इंग्लैंड तराशा जा रहा है, गढ़ा जा रहा है, ढाला जा रहा है एक सूत में

यहाँ सब एक लोग होंगे– सब एक स्वामी को सेवा देंगे
(कोई पुजारी या नवाब नहीं बचेगा!)
यहाँ पर एक निर्देश,एक चेतना, एक कानून, एक शक्ति और एक शासन होगा
इंग्लैंड तराशा जा रहा है, गढ़ा जा रहा है, ढाला जा रहा है एक शक्ल में