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वो रातें याद आती हैं मुझे / 'अख्तर' शीरानी

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'आह ! वो रातें, वो रातें याद आती हैं मुझे'
आह, ओ सलमा ! वो रातें याद आती हैं मुझे
वो मुलाक़ातें, वो बातें याद आती हैं मुझे
हुस्न-ओ-उलफ़त की वो घातें याद आती हैं मुझे
आह ! वो रातें वो ...

जब तुम्हारी याद में दीवाना-सा रहता था मैं
जब सुकून-ओ-सब्र से बगाना-सा रहता था मैं
बेपिए मदहोश-सा, दीवाना-सा रहता था मैं
आह ! वो रातें वो ...

जब तुम्हारी जुस्तुजू बेताब रखती थी मुझे
जब तुम्हारी आरज़ू बेख़्वाब रखती थी मुझे
मिस्ल-ए-मौज-ए-शोला-ओ-सीमाब रखती थी मुझे
आह ! वो रातें वो ...

मुनतज़िर मेरी, जब अपने बाग़ में रहती थीं तुम
हर कली से अपने दिल की दास्ताँ कहती थीं तुम
नाज़नीं होकर भी नाज़-ए-आशिक़ी सहती थी तुम
आह ! वो रातें वो ...

सरदियों की चान्दनी, शबनम-सी कुमलाती थी जब
शबनम आकर चार सू मोती से बरसाती थी जब
बाग़ पर इक धुन्दली-धुन्दली मस्ती छा जाती थी जब
आह ! वो रातें वो ...

जब तुम आ जाती थीं, बज़ुल्फ़-ए-परेशाँ ता कमर
इत्र पैमाँ ता बज़ानू, सुम्बुलिस्ताँ ता कमर
मुश्क आगीं ता बदामाँ, अम्बर अफ़शाँ ता कमर
आह ! वो रातें, वो रातें,
वो रातें याद आती हैं मुझे !