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वो सुकूँ है जबसे निकला हूँ उमस भरे मकाँ से / मयंक अवस्थी

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वो सुकूँ है जबसे निकला हूँ उमस भरे मकाँ से
मुझे गर्म लू के झोंके भी लगे हैं सायबाँ से

ये तमाम उम्र गुज़री बड़े सख्त इम्तिहाँ से
न थी खुदकुशी की ताक़त न ही लड़ सके जहाँ से

शबे-ग़म की ज़ुल्मतों में ये ज़मीन मुतमईन थी
कभी आयेगा उतरकर कोई नूर कहकशाँ से

मैं शिकस्त दे चुका था कभी बहरे- बेकराँ को
मैं शिकस्त खा गया हूं किसी अश्के- बेज़ुबाँ से

मेरी शाइरी से हँसकर कहा दर्द ने चमक कर
कोई धूप भी तो निकली तेरे ग़म के आसमां से

 ओ चमन की ख़ाक पाँओं में भी बिछ के मिल सका क्या
 कोई प्यार इन गुलों से कोई रब्त बागबाँ से