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वो सुलेख-मालाओं की सूक्तियों वाले ईश्वर / रुडयार्ड किपलिंग / तरुण त्रिपाठी

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सभी युगों और कुलों में अपने अवतारों से गुज़रते हुए
मैं दंडवत होता हूँ बाज़ार-स्थल के ईश्वरों के प्रति.
विनीत उंगलियों के बीच से मैं देखता हूँ उन्हें पनपते और गिरते हुए,
और वो सुलेख-मालाओं की सूक्तियों वाले ईश्वर, मैंने देखा, कायम रहते हैं उन सबसे आगे.

हम जंगलों में रहते थे जब वे मिले थे हमें, तो उन्होंने हमें दिखाया था
कि पानी हमें हर हाल में भिगाता है, जैसे आग हमेशा जलाती है हमें:
पर हमने पाया कि उनमें कमी थी उन्नति, दूरदृष्टि और बुद्धि के पुट की,
तो हमने छोड़ दिया उन्हें गुरिल्लों को सिखाने के लिए,
और हम आगे बढ़ चले मानव-जाति की दौड़ में.

हम चले जैसे हम ने चाहा. उन्होंने कभी नहीं बदली अपनी चाल,
बाज़ार-स्थल के ईश्वरों की तरह वे ना थे मौसम या हवा की उपज,
लेकिन हमारे विकास में वे हमेशा हमारे पीछे-पीछे रहे, और अब यही शब्द आते हैं
कि एक जनजाति निर्वासित हो गयी अपनी धरती से, या रोम से चली गई रौशनी.

उन उम्मीदों से जिन पर बनी है हमारी दुनिया पूरी तरह थे वे दूर,
उन्होंने इनकार किया कि चाँद बना है कोई दूध से; इनकार किया कि वह है कोई डच देश का भी;
उन्होंने इनकार किया कि इच्छाएँ होती हैं घोड़े; इनकार किया कि सूअरों के हो सकते हैं पंख
अतः हमने भक्ति की बाज़ार-स्थल के ईश्वरों की जो वादा देते इन सुंदर चीज़ों का.

जब गढ़ी जा रही थी कैम्ब्रियन पारिस्थितिकी, निरंतर शांति का किया इन्होंने वादा.
इन्होंने वचन दिया, अगर हम दे दें इन्हें अपने हथियार, थम जाएंगे इन कबीलों के ये युद्ध.
लेकिन जब हम निःशस्त्र हुए इन्होंने हमें बेच दिया और भेज दिया हमें बना के हमारे दुश्मनों का गुलाम,
और वो सुलेख-मालाओं की सूक्तियों वाले ईश्वर कहते रहे: "युद्ध के लिए तैयार रहना निरस्त्र होने से बेहतर है"

उन पहले फ़ेमिनियन सैंडस्टोनों* पर हमसे परिपूर्ण जीवन का था वादा
(जो शुरू होता अपने पड़ोसी को प्यार करने से और ख़त्म होता उसकी पत्नी से प्यार करने पर)
जब तक हमारी औरतें वापस न चाहने लगें बच्चे और ये आदमी वापस न पाएं विवेक और विश्वास,
और वो सुलेख-मालाओं की सूक्तियों वाले ईश्वर कहते रहे: "पाप की कमाई मृत्यु होती है"

उस कार्बन के युग* में सब के लिए था बहुतायत का वादा,
चुने हुए 'पीटरों को लूट कर, बाँट कर पॉलों के समाज में';
मगर, भले बहुत था हमारे पास धन, पर कुछ नहीं था उस धन से जो ख़रीद सकें
और वो सुलेख-मालाओं की सूक्तियों वाले ईश्वर कहते रहे: "जो श्रम नहीं करता वह मर जाता है".

तो वे बाज़ार-स्थल के ईश्वर लुढ़क गए, और उनके नाज़ुक जुबान के जादू सब ख़त्म हुए
और उस सबसे नीच का दिल भी नम्र हुआ और वह विश्वास करने लगा कि यह सच है
कि 'हर चमकने वाली चीज़ सोना नहीं होती', और 'दो और दो मिल के चार होते हैं'
और सुलेख-मालाओं की सूक्तियों वाले ईश्वर लंगड़ा कर आये इसे एक और बार समझाने के लिए.



जैसा कि भविष्य में होगा, ऐसा ही था आदमी की उत्पत्ति के वक़्त
निश्चित हैं केवल चार चीज़ें जब से हुआ समाज का विकास.
कि 'एक कुत्ता लौटता है अपनी उल्टी पर' और 'सुअरी लौटती है अपने कीचड़ में'
और 'एक जले मूर्ख की पट्टी बंधी उंगली वापस लहराती है आग में';

और यह कि जब यह पा लिया जाता है, और एक पूरी 'नयी दुनिया' शुरू होती है,
जब उसके अस्तित्व का हर शख़्स को मूल्य अदा होता है और किसी शख़्स को नहीं चुकाना होता है उसके पापों का मूल्य,
उतनी ही निश्चितता से जितनी यह है कि पानी हमें भिगायेगा, जितनी है कि आग जलायेगी,
सुलेख-मालाओं की सूक्तियों वाले ईश्वर लौट जाते हैं होकर भयभीत!



  • {१. कैम्ब्रिया एक भूवैज्ञानिक युग था जिसमें जानवरों का सबसे ज़्यादे विस्तार हुआ। हालाँकि यहाँ वेल्श देश के 'लॉयड जॉर्ज' की तरफ़ इशारा है जो विश्व युद्ध प्रथम के समय प्रधानमंत्री थे, चूंकि 'वेल्श' का लैटिन नाम 'कैम्ब्रिया' है। 'ट्रीटी ऑफ़ वरसेल्स' जिसमें ये शामिल हुए थे, रुडयार्ड को नापसंद था। उसके तहत सभी बड़े देशों को हथियार छोड़ने की प्रतिज्ञा लेनी थी.. जिस पर सभी युद्धों को ख़त्म होना था।

२. 'फ़ेमिनियन' किसी भूवैज्ञानिक युग के शब्द के मानिंद बनाया गया शब्द है। लेकिन हालाँकि इसका तात्पर्य स्त्री की स्वतंत्रता से है, जो रुडयार्ड के वक़्त एक जीवंत मुद्दा था। कुछ श्रोतों के अनुसार 'फ़ेमिनियन सैंडस्टोन्स' चर्चों के बनने के लिए आधारशिला हुआ करते थे।
३. कार्बोनी भी एक भूवैज्ञानिक युग था जिसमें कोयलों का प्रयोग शुरू हुआ। हालाँकि यहाँ अर्थ कोयले की खदानों वाले ट्रेड यूनियनों की बढ़ती शक्ति वाले समय से है।