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शब्दों की बाज़ीगरी / अनिल अनलहातु

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वे शब्दों की जो बाज़ीगरी
दिखा रहे थे,
वो मैं समझता था ।

शब्दों को
झूठ के माँजे से रगड़कर
उन्होने एक कविता नाँधी
और छोड़ दिया उसे अनन्त में
एक पतंग की तरह ।

वे फिर वापस आए
और शब्दों का टोटा पड़ जाने का
रोना लेकर बैठ गए ,
हाथ मलते हुए उन्होने
पछताते हुए से
कुछ तिस्कृत शब्दों को
तीन नीम्बुओं या पाँच टोपियों की तरह
नचाते हुए
जादू दिखाने लगे ।

शब्द जो कभी ‘पाश’ की
ऊबड़-खाबड़ कविताओं से
चले थे,
आकर एक रेशमी मसहरी में
क़ैद हो गए हैं
एक छद्म बौद्धिक व्यक्ति के
पीठ की खुजलाहट
मिटाने वास्ते ।
                                                                                                                                                   जहां शब्द
अपने ही अर्थ से
व्यर्थ हो जाते हैं ,
उन्हीं शब्दों की तस्करी कर
वे आज पूजनीय बने हुए हैं
और इस अकड़ में
गर्दन टेढ़ी कर
भाषा को किसी ‘कीप” की तरह
इस्तेमाल करते हैं,
 
भाषा जो उनके
भावी सुसज्जीत कमरे मे
पोंछा मारती दाई है ,
शब्द जो उनके फेंके
जूठन खाते
आवारा बच्चे हैं ,
उन्हें वे बड़ी होशियारी से,
सावधानी से चुनते हैं
कुछ इस तरह से
कि उन्हें कविता की बिछावन पर
सजा तो सकें
पर धूल गर्द से भी
बच जाएँ ,

और फिर
यह साबित करने के लिए
कि वे भी खेले हैं
धूल और गर्द में,
वे राह चलते
किसी फटीचर शब्द से
माँग लेते हैं एक बीड़ी,

और फिर
अपनी ही दृष्टि में आत्मविमुग्ध हो
हुचुक-हुचुक कर हंसते हैं,
और ‘धूमिल’ की भाषा मे
‘तिक है – तिक है ‘ कहते हैं ।

शब्दो का यह जो नेटुआपन
आप खेल रहे हैं,
यह आपको महँगा पड़ेगा
क्योंकि आजकल कुछ
विद्रोही शब्द भी चलन मे आ गए हैं ,
जो आव न ताव देखते हैं
और किसी मँचासीन भाषा के दलाल के
मुंह पर पिच्च से
थूक देते हैं ।