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शब्द/ सजीव सारथी

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शब्द,
ठीक थे जब तक खूंटों से बंधे थे,
शब्द,
कल शाम खुल गए खूंटों से,
आज़ाद हो गए,
हवाओं में उड़ने लगे गुब्बारों की तरह,
शब्द,
कोरे थे, मासूम थे सब,
तिरस्कृत हुए, अपमानित हुए,
कुछ इतने शर्मसार हुए,
कि दुबक गए
दुनिया के किसी कोने में जाकर,
कुछ डूब मरे दरिया में,
शब्द कुछ जो भाषाओं की
सीमाएं लांग गए थे,
उनका धरम जांचा गया,
आश्चर्य, सब ने एक स्वर में उन्हें करार किया-
दोषी… दोषी
हुक्म दिया, सजा-ऐ-मौत का,
सरे बाज़ार किया गया उनका सर,
धड़ से जुदा,
ताकि दुबारा कभी कोई शब्द,
न करे ये जुर्रत,

शब्द कुछ,
कल शाम निकले थे
बाज़ार में घूमने,
रात शहर में हुए
बम धमाकों में मारे गए,
दोस्ती,
प्यार,
विश्वास,
इंसानियत....
लम्बी है बहुत, मृतकों की सूची,

शब्द,
जो एक अमर कविता बन जाना चाहते थे,
कुछ दिन और जिन्दा रह जाते -
अगर जो खूंटों से बंधे रहते…