भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए
लोक संगीत
कविता कोश विशेष क्यों है?
कविता कोश परिवार

शरत खण्ड / गेना / अमरेन्द्र

Kavita Kosh से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

आसिन के माह बीती गेलै ऐलै आबेॅ कातिक
कैतकारोॅ हवा सौसें देह गुदगुदाबै छै
जेना छुवी देल रहेॅ मोरोॅ केरोॅ पखना सेँ
छिनमान होने हवा देहोॅ केॅ बुझाबै छै
रूई नाँखी उड़ै लेॅ चाहै छै मोॅन रहि-रहि
देहो केॅ बँधी केॅ रहबोॅ आय नै सुहाबै छै
फूल हेनोॅ दिनोॅ मेँ पराग नाँखी सौंसे रात
मनोॅ के बौराबेॅ लागेॅ -कातिक कहाबै छै।

धोलोॅ -धोलोॅ रात लागै, दिन भी नहैलोॅ हेनोॅ
साफ-साफ सरँगो भी कांचे रँ सुहाबै छै
गरदा के नाम नै कहीं पे जरियो टा भी छै
चुनी-चुनी बीछी लेलेॅ रेॅ हेॅ हेने लागै छै
रेशमी पटोरी रँ माँटी, मोॅन होने मोहै
मनोॅ सेँ विराग-जप-जोग केॅ भगावै छै
धोबी सेँ धुलैलोॅ दगदग धोती हेनोॅ दिन
जोगियो रोॅ निरमल मनोॅ केॅ लजाबै छै।

डाँड़े-डाँड़ गेना आबी रहलोॅ उदास खिन्न
टग्घै-झुक्कै, रुक्कै फेरू खुद केॅ सम्हारै लेॅ
साँझोॅ के संझबाती जरी चुकलोॅ छै घरेॅ-घरेॅ
पंडौ भी जुगाड़ोॅ मेँ छै आरती उतारै लेॅ
मनबिच्छा पाबै लेॅ मसूदन के द्वारी पर
ठाढ़ी छै जनानी-छौड़ी अँचरा पसारै लेॅ
झटकलोॅ-झटकलो गेनौ आबी रहलोॅ छै
बाबा केॅ कहै लेॅ कुछ, बाबा केॅ पुकारै लेॅ।

जोरोॅ सेँ, हौले सेँ बाजै-टुनटुनी मन्दिरोॅ मेँ छै
घंटा नाद सेँ मनार घन-घन करै छै
बाबा रोॅ पुजारी आरो भक्त रोॅ झुमै छै मोॅन
नाद सुनी पापी रोॅ करेजोॅ केन्होॅ डरै छै
बंशी जेना कृष्ण रोॅ गोपी रोॅ मोॅन हरै छेलै
भागवत-भजन होन्है केॅ मोॅन हरै छै
ठ्ट्ठ भीड़ लागलोॅ छै देवोॅ रोॅ दुआरी पर
जहाँ सुख बरसै छै, जहाँ पुन्य फरै छै।
पूर्णिमा रोॅ रात छै, आकासोॅ मेँ दूधिया चान्द
चाँदी रोॅ जलैलोॅ दीया-हेने ही दिखाबै छै
जेना बोहोॅ मेँ भाँसे छै कागज रोॅ नाव आरी
बच्चा सीनी देखी-देखी हाँसे, नाचै, गाबै छै
ओन्हे बोहोॅ चाँदनी रोॅ बहै छै धरती पर
भाँसे छै मंदार देखी चाँद मुस्काबै छै
ठाहाका इन्जोरिया के डरोॅ सेँ अन्हार आय
आपना केॅ घोॅर, लत्ती तोॅ र मेँ नकाबै छै।

धानोॅ सेँ जरी टा उच्चोॅ गेना, धानोॅ केॅ हटैनें
आबी गेलै मन्दिरोॅ के एकदम सामना
झपटी-झपटी चलै मेँ ऊ हाँफी रहलोॅ छै
रुकै छै केन्हौं केॅ नै शरीरोॅ केरोॅ घामना
पोछी केॅ हाथोॅ सेँ घाम, साँसोॅ केॅ जोरोॅ सेँ खींची
छोड़ी देलकै गेना नेँ बहुत आबी सामना
मतुर दुआरी पर गोड़ धरतेॅ ही हाय
रही गेलै मने मेँ मनोॅ रोॅ मनोकामना।

”केना जाँव भीतर मेँ बाबा रोॅ सूरत देखौं
लोगोॅ लेॅ हम्मेँ तेॅ होने, जेनाकि बच्चा लेॅ भूत
हम्मेँ नै बडोॅ बड़ोक्का, बड़ोॅ कुलोॅ रोॅ चिराग
आकि धरमोॅ के मालिक, टाका वाला केरोॅ पूत
हम्में ऊ जाति रोॅ छेकौं जेकरा कि काम एक
सब्मे रोॅ गूं साफ करौं आरो साफ करौं मूत
जेना आँख ऐला पर रोशनी आँखी केॅ गड़ै
सब्भे लोगोॅ के बीचोॅ मेँ होनै केॅ हम्में अछूत।

”ऊ दिनाँ पुरोहितो सेॅ बोलै छेलै यही नी कि
‘भगवान घट-घट मेँ निवास करै छै
एक्के ब्रह्म धरलेॅ छै यहाँ मेँ अनेक रूप
सब्भे मेँ बराबरे वही विलास करै छै
जबकि एक्के ही देव जीव दै छै, पालै-पोसै
आरो एक्के देव सब केॅ विनाश करै छै’
तबेॅ केना भेद भेलै आदमी-आदमी मेँ ही
एक-दूसरा के कहिनें उपहास करै छै।

”कभी-कभी तेॅ लागै छै हमरा यही कि प्रभु
ठिक्के कैहलोॅ छौ तोहें गीता मेँ हँकारी केॅ
तारा मेँ चन्द्रमा छेकौ, देवता मेँ इन्द्रदेव
पर्वतोॅ मेँ मेरू रूप आबौ तोहें धारी केॅ
सागरे जलाशय मेँ छौ, हाथी मेँ एरावत ही
कामधेनु गाय मेँ छोॅ -लघुता केॅ बारी केॅ
पशु मेँ होनै केॅ सिंह, ऋतु मेँ वसन्त छेका
तबेॅ छोटोॅ रोॅ के होतै? सोचलौ विचारी केॅ।

”यहेॅ तेॅ सुनै छियै कि पापी सेँ पापी केॅ तोहें
तारी देलौ! तरलै जरा-सा नाम लेथैं नी
बालमीकि तरलै तेॅ तरलै अजामिल भी
तरी गेलै गोड़ोॅ सेँ अहिल्या भी छुवैथैं नी
पातकी-पतित कत्तेॅ पापोॅ सेँ विमुक्त भेलै
याद तोरोॅ एक बार हिरदै मेँ ऐथैं नी
यही सब सुनी आबी गेलोॅ छियौं द्वारी पर
कहै छौं-हाथी के सुनलौ सूँढ़ के उठैथैं नी।

”हम्में नै चाहै छी प्रभु उच्चोॅ घोॅर, उच्चोॅ जात
मोक्ष भी हम्में नै चाहौं, हम्मेँ यही चाहै छी
काटी लियौं जाड़ा केन्हौं ऐतनै करी देॅ तोहें
आरो तेॅ केन्हौं केॅ सब्भे जेना होय छै साहै छी
लागै छै यही कि प्रभु काटेॅ पारबोॅ नै जाड़ा
जबेॅ-जबेॅ आपनोॅ ही सामरथ थाहै छी
आरो की कहौं तोरा सेँ, सब्भे बात जानथैं छोॅ
होनै निभी जाय आबेॅ जेनाकि निबाहै छी।“

एतना कही केॅ गेना मने-मन लौटी ऐलै
आरो चढ़ी गेलै फेरू खेतोॅ केरोॅ आरी पर
गाढ़ोॅ दूध नाँखी वहेॅ चाँदनी, उफनैलोॅ रँ
बहै छै छप्पर पर, छोॅत आरी-बारी पर
मेटकी चानोॅ रोॅ जेना फटी गेलोॅ रहेॅ आरो
दूध बही गेलोॅ रहेॅ सुखदा-कछारी पर
लूटै छै चाँदनी परी छत्तोॅ पर चढ़ी-चढ़ी
रधवा रोॅ रधियो भी आपनोॅ खमारी पर।

टकटकी लगाय केॅ गेना चाँद केॅ निरासेॅ लागलै
माथा पेॅ पिठाली सेँ ही टिकुली बनैलोॅ चाँद
सरंगोॅ रोॅ कल्पदु्रम आँखी रोॅ आगू मेँ रहेॅ
आरो जेकरा मेँ लागै फूलै रँ फुलैलोॅ चाँद
नीला-नीला सरँगोॅ के सागर मथैला सेँ ही
भीतर सेँ अनचोकै बाहर ज्यों ऐलोॅ चाँद
नीचेॅ छुपी गेलोॅ छै की बाँही सेँ छुटी केॅ प्रिया
ऊपर सेँ झाँकी-झाँकी देखै छै बिहैलोॅ चाँद

कत्तेॅ गोरोॅ-गोरोॅ बनी रहलोॅ छै बौंसी-देह
लागै छै कि मली-मली दूधोॅ सेँ नहैले रहेॅ
झुक्कोॅ-झुक्कोॅ फूल नै ई खिललोॅ छै; हेने लागै
आपने सेँ गूँथी-गूँथी खोपा मेँ सजैलेॅ रहेॅ
चललोॅ छै पूजै लेॅ ही मनकामना मन्दिर
मनोॅ मेँ पुरै के कोय कामना मनैलेॅ रहेॅ
मंदारोॅ के ऊपर मेँ चमकै छै चाँद हेने
हाथोॅ मेँ पूजा के थाली जेना कि उठैलेॅ रहेॅ।

देखी-देखी आचरज गेना केॅ हुऐ छै घोर
चाँद छेकै या कंतरी दही रोॅ जमैलोॅ छै
आकि उतपाती कोनो बच्चा नें गुलैलोॅ सेँ ही
आकासोॅ मेँ बड़ोॅ-बड़ोॅ छेद करी देलोॅ छै
नै-नै ई शकुन्तला रोॅ वने केरोॅ खरगोश
भूलोॅ सेँ मैदानोॅ मेँ जे हिन्नेॅ चली ऐलोॅ छै
रही-रही गेना-हाथ पकड़ै लेॅ उठी जाय
चिन्तै की जे लोगें कहै-गेना उमतैलोॅ छै।

जेनाकि करै छै कोय देखीॅ अजूबा चीज
होन्है ही कराय आय चान छै बेचारा केॅ
चान की? लागै छै जेना नीलम-परातोॅ मेँ ही
कल्हेॅ-कल्हेॅ घुड़कैतेॅ रहेॅ कोय पारा केॅ
आकि खाली मूड़ी देवदूत रोॅ दिखाय पड़ै
तैरै मेँ पानी रोॅ बीच-पाबै लेॅ किनारा केॅ
देखी-देखी गेना छै बौरैलोॅ जेना ओकरा केॅ
घोरी केॅ पिलैलेॅ रहेॅ भाँग मेँ धतूरा केॅ।