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शरद / बरीस पास्तेरनाक

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मैंने अपने परिवार को बिखर जाने दिया है,
मेरे सारे प्रिय जन तितर-बितर हो गए हैं ।
एक जीवन-व्यापी अकेलापन
प्रकृति को और मेरे हृदय को भर देता है ।

और यहाँ मैं हूँ तुम्हारे साथ, एक छोटे से घर में
बाहर, जंगल निर्जन है वीराने की तरह ।
जैसा कि कविता में होता है, वाहन-मार्ग और पैदल-पथ
बहुत अधिक बड़े हो गए हैं ।

लहू की दीवारें दुखी हैं,
सिर्फ़ हम दो को ही देख पाने के कारण ।
पर हमने कभी अवरोधों को लाँघने का काम नहीं किया ।
हम सचाई से मरेंगे ।

एक बजे हम मेज़ पर बैठेंगे,
तीन बजे हम उठ जाएँगें,
मैं अपनी क़िताब लेकर, तुम अपनी कढ़ाई लेकर ।
सुबह हम याद नहीं रखेंगे
कि कब हमने चूमना बन्द किया था ।

पत्तियो, सरसराओ और बिखर जाओ
और भी भव्यता से, और भी प्रमत्त होकर,
कल के कड़ुवे प्यालेव को और पूरा
भर दो आज की पीड़ा से ।

प्रेम, कामना और आनन्द को
सितम्बर के कोलाहल में छितरा जाने दो :
और तुम, जाओ और चटखते शरद में छुप जाओ,
या तो चुप हो जाओ या हो जाओ उन्मत्त ।

तुम शरीर से अपनी पोशाक फेंकती हो ।
जैसे झाड़ी अपनी पत्तियाँ गिराती है ।
रेशमी फुँदने के ढीले चोगे में
तुम मेरी बाहों में आ गिरती हो ।

बरबादी के रास्ते का तुम अच्छा उपहार हो
जब जीवन बीमारी से भी अधिक बीभत्स है
और दुःसाहस है सौन्दर्य का मूल कारण ।
यही वह चीज़ है जो हमें एक-दूसरे के साथ रखती है ।