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शाने पे सर रखते, शाना बोल उठा / सूरज राय 'सूरज'

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शाने पर सर रखते, शाना बोल उठा।
दीवाने को देख दीवाना बोल उठा॥

तेरे आगे तुझको ज़ालिम कौन कहे
तूने फेरी पीठ ज़माना बोल उठा॥

तेरे आँसू मुझको भटकाते तब तक
तेरा सच इक घाव पुराना बोल उठा॥

मेरी ख़ातिर तुम लोगों ने किया ही क्या
बेटे! तेरा आज कमाना बोल उठा॥

कान लगाकर भूखे पंछी बैठ गये
जाल में बिखरा दाना-दाना बोल उठा॥

बस्ती के लोगों ने पकड़ा इक डाकू
जिसको देख के, साहब! थाना बोल उठा॥

जीसस ईश्वर अल्लाह, छोड़ो कौन हैं ये
सिर्फ़ मुहब्बत इक मस्ताना बोल उठा॥

कैसे हो? पर मुफ़लिस लब चुपचाप रहे
पर आँखों में बन्द खज़ाना बोल उठा॥

मैं क्या हूँ तेरी नज़रों में ऐ दुश्मन
तेरा मुझको दवा पिलाना बोल उठा॥

 "सूरज" एक ग़ुलाम मैं मर्ज़ी का मालिक
जुगनू के होठों से ताना बोल उठा॥