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शाम में / कंस्तांतिन कवाफ़ी

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किसी भी तरीक़े से वे चीज़ें देर तक क़ायम नहीं रह पातीं ।
सालहों साल के तजुर्बो ने यह मुझे दिखाया है । लेकिन नियति आई
थोड़ा उतावला हो और उन्हें रोक दिया ।
सुंदर जीवन संक्षिप्त था ।
लेकिन कितने तेज़ थे इत्र ।
कितना चमकीला था बिछौना जिस पर हम सोए
कितना ऐंद्रिय आनंद अपने शरीरों को हमने दिया ।

विलास के दिनों की एक गूँज,
मेरे क़रीब लाती है दिनों की एक गूँज,
हम दोनों के यौवन की ज़रा बची आग,
फिर से एक ख़त लिया अपने हाथों में मैंने,
और मैंने पढ़ा और फिर पढ़ा जब तलक चली न गई रोशनी ।

और अवसाद, मैं बाल्कनी में चला आया बाहर -
बाहर आया झटक देने कम-अज़-कम अपने ख़यालों को नज़र डालते हुए
शहर के एक कोने पर जिसे मैंने प्यार किया,
एक ज़रा-ज़रा चहल-पहल गली में और दुकानों में ।

 
अँग्रेज़ी से अनुवाद : पीयूष दईया