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शेर-14 / असर लखनवी

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(1)
माना कि आंसुओं को पीना है मस्लेहत1,
आँसू जो फिर भी उमड़ ही आयें तो क्या करें?

(2)
मुझे हर खाक के जर्रे पर यह लिक्खा नजर आया,
मुसाफिर हूँ अदम2 का और फना3 है कारवाँ मेरा।

(3)
मैं अपना दर्दे-दिल कहता हूँ, वह मुंह फेर लेते है,
खुदाबंदा4! यह कैसे दर्दे - दिल के कद्रदाँ निकले।

(4)
मैं बताऊँ मुझको तड़पाना अगर मंजूर है,
दिलनवाजी5 भी शरीके-नाज होना चाहिए।



(5)
मैं समझता हूँ बर्क6 चमकती है,
लोग कहते हैं आप आये हैं।

1.मस्लेहत - (i)हित, भलाई (ii) सलाह, परामर्श 2.अदम - परलोक, यमलोक, जहाँ मनुष्य मर कर जाता है 3.फना - मृत्यु, मौत, मरण 4.खुदाबंदा - हे ईश्वर 5.दिलनवाजी - (i) मैत्री, दोस्ती (ii) सान्तवना, ढाढस 6.बर्क - बिजली, तड़ित, चपला, सौदामिनी