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शोभावती / शंकर्षण परिड़ा / दिनेश कुमार माली

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रचनाकार: शंकर्षण परिड़ा (1961)

जन्मस्थान: इंद्रप्रस्थ,सर्वोदयनगर, पुरी

कविता संग्रह: माया-मंच(1995), शब्द-दर्पण (2005), अँग्रेजी अनुवाद (वायस ऑफ मिरर) (2010), चित्राक्षर (2011)


मैं जानता हूँ मेरी आँखें नहीं है
फिर भी मुझे दिखाई पड़ रहा है
तुम्हारा सौन्दर्य और गुणवत्ता का अक्षुण्ण नारीत्व !
शोभावती दृश्य !

मेरे कान नहीं है फिर भी मुझे सुनाई पड़ रही हैं
तुम्हारे आवेग और उन्माद में
तल्लीन और तन्मयमिश्रित तान
तुम्हारे प्रणय राग के ललित मधुर स्वरों का आरोहण- अवरोहण।

वास्तव में मेरा मुँह नहीं है
मगर उच्चारण कर सकता हूँ
ललित लवंग लता
प्रिय प्रियतम निशब्द कविता
बिना होठों के स्पर्श करता हूँ
तुम्हारी भीगी पलकों को
बिना कंठ के गा सकता हूँ
आँसू की गजल, खून की कविता
मेरे पाँव नहीं है फिर भी कह नहीं पाऊँगा
अच्छा होता अगर मेरे पक्षियों जैसे पंख लग जाते
मैं तो योजन- योजन घूम सकता हूँ
मैं तो तुम्हारा तन- मन स्पर्श कर सकता हूँ
मैं शोभावती प्रियतमा को समझ सकता हूँ
तुम्हारी निर्नाद नीरवता और
मन्द मधुर सम्मोहन।
मेरे हाथ नहीं है
फिर भी तुमको पकड़ सकता हूँ
मेरे उदग्र आलिंगन में
देह की दहलीज को पारकर
हृदय मंदिर में तुम्हें
सदियों- सदियों तक कैद रखूंगा।
शोभावती प्रियतमा
तुम्हारे होते हुए कैसे कहूंगा
मेरे हाथ नहीं, पाँव नहीं
मुंह नहीं आँख नहीं कान नहीं
चोट लग जाए तो दोष नहीं
मेरी प्राण संगिनी ।