भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए
लोक संगीत
कविता कोश विशेष क्यों है?
कविता कोश परिवार

श्रीमान विरोधी / बालकृष्ण काबरा 'एतेश' / लैंग्स्टन ह्यूज़

Kavita Kosh से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

एक नीग्रो लोकगीत

श्रीमान विरोधी, श्रीमान विरोधी,
आखिर तुम मुझे समझते क्यों नाकाम ?
तुम बढ़ाते मेरे टैक्स, रोक लेते मज़दूरी,
मेरे बेटे को भेज देते वियतनाम।

तुम देते मुझे दोयम दर्जे के स्कूल,
दोयम दर्जे के मकान,
क्या तुम समझते हो कि काले लोग हैं
दोयम दर्जे के मूर्ख इंसान?

जब मैं चाहता कुछ नक़द कमाई
ढूँढ़ता कोई काम,
तुम्हारे पास देने को होता
बस, विरोध ओ गोरे श्रीमान।

किन्तु यह संसार बहुत बड़ा
चमकीला, गोल, महान
इसमें रहते मेरे जैसे
काले, पीले, भूरे, चितले इंसान।

श्रीमान विरोधी, श्रीमान विरोधी,
क्या समझते हो तुम, क्या खो दूँ अपना मान?
गाते हुए तुम्हारी अधमता का विरोध गीत
हो रहा मैं तुमसे अलग ओ श्रीमान।

अब होगा तुम्हारे लिए ही
उदास गीत।
नहीं मेरे लिए अब और
देख लेना, बस थोड़ी प्रतीक्षा और !

अँग्रेज़ी से अनुवाद : बालकृष्ण काबरा ’एतेश’