भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए
लोक संगीत
कविता कोश विशेष क्यों है?
कविता कोश परिवार

सजन में है शुआर-ए-आशनाई / वली दक्कनी

Kavita Kosh से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

सजन में है शुआर-ए-आशनाई
न हो क्‍यूँ दिल शिकार-ए-आशनाई

सनम तेरी मुरव्‍वत पे नज़र कर
हुआ हूँ बेक़रार-ए-आशनाई

निपट दुश्‍वार था मुझ दिल में ऐ जाँ
ज़मान-ए-इंतिज़ार-ए-आशनाई

हुआ मालूम तुझ मिलने सूँ लालन
कि रंगीं है बहार-ए-आशनाई

हया के आब सूँ बाग़-ए-वफ़ा में
रवाँ है जू-ए-बार-ए-आशनाई

वफ़ा दुश्‍मन न हो ऐ आशनारू
वफ़ा पर है मदार-ए-आशनाई

मुरव्‍वत के हमेशा हाथ में है
इनान-ए-इख्ति़यार-ए-आशनाई

मदारा है हिसार-ए-आशनाई
'वली' इस वास्‍ते गिर्यां हूँ हर आन
कि तर हो सब्‍ज़ाज़ार-ए-आशनाई